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शतरुद्रीय और रुद्राभिषेक (Shat rudri) शत रुद्री पाठ /शत रुद्री /शतरुद्रीय/ shata rudriya/ rudra abhishek/Shatarudriya, Satarudriya, Rudradhyay Rudrasukta शतरुद्रिय’, ‘रुद्राध्याय’, ‘रुद्रसूक्त’ 


Shat rudri /शत रुद्री पाठ /शत रुद्री  /शतरुद्रीय/ shata rudriya/ rudra abhishek/ Shatarudriya, Satarudriya, Rudradhyay Rudrasukta 
शतरुद्रिय’, ‘रुद्राध्याय’, ‘रुद्रसूक्त’ 

Significance of Shatrudriya/Importance of Rudrabhishek


शतरुद्री अर्थात 100 मंत्रो से रुद्र पूजन या अभिषेक
Rudr Pujaan or Abhishek from Shatrudri (Meaning Performing Abhishekam with 100 Mantras)

शिव पुराण में शतरुद्री से शिव पूजन अभिषेक आदि का बड़ा अत्युत्तम माहात्म्य बताया गया है। इसमें भी मंत्रो का प्रयोग रुद्राष्टाध्यायी से ही किया गया है।
कुछ मन्त्र बाहर से लिये गये हैं।
शतरुद्री सम्बन्धी वाक्य इस प्रकार मिलते हैं:-

षष्ठषष्ठि नीलसूक्तं च पुनर्षोडशमेव च।।
एषते द्वे नमस्ते द्वे नतं विद्द्द्वयमेव च।।
मीढुष्टमेति चत्वारि वय गुंग चाष्टमेव च।।
शतरुद्री समाख्याता सर्वपातकनाशिनी।।

यों शतरुद्री का प्रयोग श्रेष्ठ होने पर भी रुद्राभिषेक में रुद्री का नमक - चमकात्मक प्रयोग विशेष रूप से प्रचलित है।

इसमें रुद्राष्टाध्यायी का पहले सात अध्याय तक पाठ करके अष्टम अध्याय में क्रमशः 4,4,4,3,3,3,2,1,1,2 मन्त्रो पर विराम करते हुए पञ्चम अध्याय अर्थात नीलसूक्त के 11 पाठ होते है।

Rudrapaathi रुद्रपाठी

शतरुद्रीय और रुद्राभिषेक

शतरुद्रीय और रुद्राभिषेक में तीन शब्द प्रधान हैं। एक ‘शत’ दो ‘रुद्र' और तीन अभिषेक’। तीनों का अर्थ जानना आवश्यक है। क्योंकि निरुक्तकारों का कथन है कि -

स्थाणुरयं भारहारः किला भूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थम्।
योऽर्थज्ञ इत सकलं भद्रमश्नुते नाक मेति ज्ञानविधूत पाप्पा॥

निरुक्तकारों का कथन है कि बिना अर्थ जाने जो वेद पढ़ता है वह भार ढोनेवाले जानवर के समान है। अथवा जनशून्य जंगल के उस आम्रवृक्ष के समान है, जो न स्वयं उस अमृतरस का स्वाद जानता है और न किसी अन्य को जानने का अवसर देता है। अतएव वेद के अर्थ का जानकार पूरे कल्याण का भागी होता है।
वेदः शिवः शिवोवेदः' वेद शिव है और शिव वेद हैं।
शिव और ‘रुद्र' ब्रह्म के समानार्थक शब्द हैं।
शिव को रुद्र इसलिये कहा जाता है। कि ये ‘रुत्' अर्थात् दुःखों के विनाशक है।।

शतरुद्रिय का महत्त्व/ Significance of Shatrudriya

शतरुद्रिय की महिमा को इसी बात से जाना जा सकता है कि एक बार याज्ञवल्क्य ऋषि से शिष्यों ने पूछा—‘किसके जप से अमृत तत्त्व (अमरता)  की प्राप्ति होती है ?’ ऋषि ने उत्तर दिया—‘शतरुद्रिय के जप से ।’

रुद्राध्याय में वर्णित भगवान रुद्र के सभी नामों में अमृतत्व प्रदान करने की सामर्थ्य है, इसके पाठ से मनुष्य स्वयं रोगों व पापों से मुक्त होकर मृत्युंजय (अमर) हो जाता है ।

केवल रुद्राध्याय के पाठ से ही वेदपाठ के समान फल की प्राप्ति होती है ।


रुद्रपाठ की महिमा/ Importance of Rudripath

 भगवान सदाशिव की उपासना में रुद्राष्टाध्यायी का विशेष महत्त्व है। शिवमहापुराण में
सनकादिक ऋषियों के प्रश्न करने पर स्वयं शिवजी ने रुद्राष्टाध्यायी के मन्त्रों द्वारा अभिषेक
का माहात्म्य बतलाते हुए कहा है कि मन, कर्म तथा वचन से एवं परम पवित्र भावना से
भगवान् आसुतोष की प्रसन्नता के लिये रुद्राभिषेक करना चाहिये। वायु पुराण में आया है कि रुद्राष्टाध्यायी के नमक (पञ्चम अध्याय) और चमक (अष्टम अध्याय) तथा पुरुषसूक्त का
प्रतिदिन तीन बार पाठ करने से मनुष्य ब्रह्मलोक में सम्मान प्राप्त करता है। जो नमक, चमक,होतृमन्त्रों और पुरुषसूक्त का सर्वदा पाठ करता है, वह उसी प्रकार महादेवजी में प्रवेश करता है, जिस प्रकार घर का स्वामी अपने घर में प्रवेश करता है। जो मनुष्य अपने शरीर में भस्म लगाकर, भस्म में शयनकर और जितेन्द्रिय होकर निरन्तर रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करता है, वह मनुष्य परा मुक्ति को प्राप्त करता है। जो रोगी और पापी जितेन्द्रिय होकर रुद्राध्याय का पाठ करता है, वह रोग और पाप से मुक्त होकर अद्वितीय सुख प्राप्त करता है।
यथा-नमकं चमकं चैव पौरुषं सूक्तमेव च। नित्यं त्रयं प्रयुञ्जानो ब्रह्मलोके महीयते।।

शतरुद्रियपाठ
शतरुद्रिय रुद्राष्टाध्यायी का मुख्यभाग है। शतरुद्रिय का माहात्म्य रुद्राष्टाध्यायी का ही
माहात्म्य है। मुख्यरूप से रुद्राष्टाध्यायी का पञ्चम अध्याय शतरुद्रिय कहलाता है। इसमें
भगवान् रुद्र के शताधिक नामों द्वारा उन्हे नमस्कार किया गया है। 'शतं रुद्रा देवता अस्येति शतरुद्रीयमुच्यते'। शतरुद्रिय का पाठ अथवा जप समस्त वेदों के परायण के तुल्य माना गया है। शतरुद्रिय को रुद्राध्याय कहा गया है। भगवान् वेदव्यासजी ने अर्जुन को इसकी महिमा
बताते हुए कहा है-

धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम्।
सर्वार्थसाधनं पुण्यं सर्वकिल्बिषनाशनम्। सर्वपापप्रशमनं सर्वदुःखभयापहा"
पार्थ! वेद सम्मित यह शतरुद्रिय परम पवित्र तथा धन, यश और आयु वाला है इसके पाठ से सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है। यह पवित्र, सम्पूर्ण किल्बिसों का नाशक तथा सभी प्रकार के दु:ख और भय को दूर करने वाला है।

पठन् वै शतरुद्रीयं शृण्वंश्च सततोत्थितः।।।
भक्तो विश्वेश्वरं देवं मानुषेषु च यः सदा। वरान् कामान् स लभते प्रसन्ने त्र्यम्बके नरः।।

| जो निरन्तर उद्यत रहकर शतरुद्रिय को पढ़ता है और सुनता है तथा विश्वेश्वर का भक्तिभाव से भजन करता है, वह उन विश्वेश्वर के प्रसन्न होने पर समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। महर्षि याज्ञवल्क्यजी ने शतरुद्रिय को अमृतत्व का साधन कहा है। पितामह ब्रह्माजी ने महर्षि आश्वलायन से शतरुद्रिय की महिमा के विषय में बताते हुए कहा है।
कि-जो शतरुद्रिय का पाठ करता है, वह अग्निपूत होता है, वायुपूत होता है, आत्मपूत होता है, सुरापान के दोष से मुक्त हो जाता है, ब्रह्महत्या के दोष से मुक्त हो जाता है, स्वर्ण की
चोरी के पाप से छूट जाता है, शुभाशुभ कर्मों से उद्धार पाता है, भगवान् शिव के आश्रित हो
जाता है तथा वह भक्त अविमुक्तस्वरूप हो जाता है। अतएव जो सांसारिक कार्यों से मुक्त हो गये हैं उन परंहंसों को सदा सर्वदा अथवा कम से कम एक बार इसका पाठ अवश्य करना
चाहिये। इससे उस ज्ञान की प्राप्ति होती है, जो भवसागर से पार लगा देता है। इसलिये
इसको इस प्रकार जानकर मनुष्य कैवल्यरूप मुक्ति को प्राप्त करता है।

शतरुद्रियपाठ विधि
शतरुद्रिय नाम से एक सौ मन्त्रों के पाठ की परम्परा भी कहीं-कहीं है-
यथा-षट्षष्टिनलसूक्तं च पुनः षोडशमेव च। एष ते द्वे नमस्ते न तं विद्यमेव च।।
मीढुष्टमेति चत्वारि वयः सोमाष्टमेव च। वेदवादिभिराख्यातमेतद्वै शतरुद्रियम्।।

अर्थात्-रुद्राष्टाध्यायी के पाँचवें अध्याय के ‘नमस्ते' इत्यादि ६६ मन्त्र, पुनः उसी
पञ्चम अध्याय के प्रारम्भिक १६ मन्त्र, छठे अध्याय के 'एषते०' और 'अवरुद्र०' ये दो मन्त्र,
पञ्चम अध्याय के 'नमस्ते' और 'याते०' ये दो मन्त्र, फिर शुक्ल यजुर्वेदसंहिता के १७वें
अध्याय के ३१वें तथा ३२वें मन्त्र ('न तं विद्' तथा 'विश्वकर्मा०') उपरान्त रुद्राष्टाध्यायी के
पञ्चमअध्याय के ५१वें मन्त्र से ५४वें मन्त्र ('मीढुष्ट' से 'असंख्याता०') तक और पुन:
रुद्राष्टाध्यायी के सम्पूर्ण छठे अध्याय के आठ मन्त्रों का यथोक्त रूप से क्रम-पूर्वक पाठ
करने पर सौ मन्त्र हो जाते हैं। सौ मन्त्र होने से इसे शतरुद्रिय कहा जाता है। सामान्यत:
सम्पूर्ण रुद्राष्टाध्यायी द्वारा रुद्राभिषेक आदि कार्य अधिक प्रचलित है।

रुद्रपाठ के भेद
रुद्र पाठ पाँच प्रकार के बताये जाते हैं (रुद्राः पञ्चविधाः प्रोक्ता)-१-रूपक या षडङ्ग
पाठ, २-रुद्री या एकादशिनी, ३-लघुरुद्र, ४-महारुद्र, तथा ५-अतिरुद्र।।


भगवान रुद्र की शतरुद्रीय उपासना से दु:खों का सब प्रकार से नाश हो जाता है । दु:खों का सर्वथा नाश ही मोक्ष कहलाता है ।

| ‘रुतम् दुःखम् द्रावयति नाशयतीति रुद्रः।'

रुद्र की श्रेष्ठता के बारे में रुद्र हृदयोपनिषद् में कथन है-

सर्व देवात्मको रुद्र सर्वे देवा शिवात्मकाः।
रुद्रात्प्रवर्तते बीजं बीज योनिर्जनार्दनः॥
यो रुद्रः स स्वयं ब्रह्मा यो ब्रह्मा स हुताशनः।
ब्रह्मविष्णुमयोरुद्र अग्निषोमात्मकं जगत्।

इसके अनुसार यह सिद्ध होता है कि रुद्र ही मूल प्रकृति पुरुषमयआदिदेव साकार ब्रह्म हैं। वेद विहित यज्ञपुरुष स्वयम्भू रुद्र है।



भगवान् रुद्र की उपासना के लिये वेद का सारभूत संग्रह रुद्राष्टाध्यायी ग्रन्थ है। जन कल्याण के लिये शुक्लयजुर्वेद से रुद्राष्टाध्यायी को संग्रह हुआ है। इसके जप, पाठ और अभिषेक आदि साधनों से भगवद्भक्ति, शान्ति, धन,धान्य की सम्पन्नता और सुन्दर स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। वहीं परलोक में सद्गति और परमपद मोक्ष की प्राप्ति होती है। वहीं परलोक में सद्गति और परमपद मोक्ष की प्राप्ति होती है। वेद के ब्राह्मण ग्रन्थों में, उपनिषदों में, स्मृतियों में, पुराणों में शिवार्चन के साथ ‘रुद्राष्टाध्यायी' या शतरुद्री के पाठ, जप,अभिषेक आदि की महिमा के विशेष वर्णन हैं। वायुपुराण में वर्णन है-

"यश्च सागर पर्यन्ता सशैलवन काननाम्।
सर्वान्नात्म गुणोपेतां प्रवृक्ष जलशोभिताम्॥
दद्यात् कांचन संयुक्ता भूमिं चौषाधिसंयुताम्।
तस्मादप्यधिकं तस्य सकृद्द्रजवाद् भवेत॥
यश्च रुद्रांजपेन्नित्यं ध्यायमानो महेश्वरम्।
स तैनैव च देहेन रुद्रः संजायते ध्रुवम्॥"

जो व्यक्ति समुद्र पर्यन्त वन, पर्वत, जल और वृक्षों से युक्त और श्रेष्ठ गुणों से युक्त ऐसी पृथ्वी का दान करता है, जो धन, धान्य, सुवर्ण औरऔषधियों से युक्त है, उससे भी अधिक पुण्य एक बार के रुद्री जप एवं रुद्राभिषेक से होता है। जो भगवान् रुद्र का ध्यान करके रुद्री पाठ करता है। अथवा रुद्राभिषेक यज्ञ करता है, वह उसी देह से रुद्र रूप हो जाता है। यह निश्चित और निस्संदेह है। ---------- वायु पुराण

अब ‘शतरुद्री' किसे कहते हैं, इस पर विचार करते हैं। ‘शत' का अर्थ एक सौ होता है। ‘रुद्र' का अर्थ कह दिया गया है। अभिषेक का अर्थ विशेष प्रकार का स्नान है। जिससे सौ रुद्रों का वर्णन हो उसे ‘शतरुद्री' कहते हैं।

शतरुद्रीय रुद्राष्टाध्यायी का मुख्य भाग है। मुख्यरूप से रुद्राष्टाध्यायी के पंचम अध्याय को शतरुद्रीय कहा जाता है। क्योंकि इसमें भगवान् रुद्र के एक सौ से अधिक नामों से उन्हें नमस्कार किया गया है।

‘शतंरुद्रादेवता अस्येति शतरुद्रीय मुच्यते'।

तंत्र गुरु गोविन्दसिंहजी के अनुसार रुद्राभिषेक दो प्रकार से होता है।
एक सम्पूर्ण रुद्राष्टाध्यायी से और दूसरा शतरुद्रीय मन्त्र से होता है।
शतरुद्री के एक सौ मन्त्रों के निम्न मन्त्र होते हैं-
1. रुद्राष्टाध्यायी के पंचम अध्याय के -- ६६ मन्त्र
2. पुनः उसी पंचम अध्याय के शुरु के -- १६ मन्त्र
3. छठे अध्याय के ‘एषते' अवरुद्रमदोमहयव० -- २ मन्त्र
4. तब पंचम अध्याय नमस्ते० या त्वे०  -- २ मन्त्र
5. तब शुक्ल यजुसंहिता के अध्याय १७ के ३१ और ३२  - २ मन्त्र
6. तब पंचम अध्याय के ५१ से ५४ चार मन्त्र -- ४ मन्त्र
7. तब छठे अध्याय के आठ मन्त्र -- ८ मन्त्र
इस तरह कुल - १०० मंत्र

इसके सम्बन्ध में प्रसिद्ध श्लोक निम्नलिखित है-

षट्षष्टि नीलसूक्तं च पुनः छोडशमेव च।
एषते द्वे नमस्ते द्वे न तं विद्वयमेव च।।
मीढुष्टमेति चत्वारि वयः सोमाष्टमेव च।

वेदवादिभिराख्यातमेतद्वै शतरुद्रियम्।।

रुद्रकल्पद्रुम आदि के अनुसार पंचम अध्याय के ६६ मन्त्र के पाठ से ही शतरुद्रीय पूरी हो जाती है। सामान्यतः पूरे रुद्राष्टाध्यायी के द्वारा रुद्राभिषेक कार्य अधिक प्रचलित है। परन्तु केवल शतरुद्रीय पाठ से अभिषेक करने पर
समय कम लगता है और प्रयुक्त होने वाले प्रशस्त द्रव्य भी कम लगते हैं। खर्च भी कम होता है।

रुद्राभिषेक में प्रयुक्त होने वाले प्रशस्त द्रव्य शास्त्रों के अनुसार कामना
के अनुसार विविध प्रकार के हैं।

१. जल से रुद्राभिषेक करने पर वर्षा होती है।
२. कुशोदक से अभिषेक करने पर व्याधि शान्त होती है।
३. पशु प्राप्ति के लिये दही से अभिषेक करना चाहिये।
४. धन प्राप्ति के लिये गन्ने के रस से अभिषेक करें।
५. मधु और घी से भी धन प्राप्त होता है।
६. तीर्थजल से अभिषेक करने पर मोक्ष मिलता है।

७. गाय के दूध से अभिषेक पुत्र प्राप्ति के लिये होता है।
८. दूध से अभिषेक करने पर वन्ध्या, काकवन्ध्या, मृतवत्सा को भी पुत्र
प्राप्त होते हैं।

९. ज्वरकोप की शान्ति के लिये जलधार से अभिषेक होता है।
१०. एक हजार मन्त्र पाठ से घृतधार से अभिषेक से वंश विस्तार होता है।
११. बुद्धि की जड़ता दूर करने के लिये शक्कर मिश्रित दूध से अभिषेक करें।
१२. शत्रुओं के विनाश के लिये सरसो तेल से अभिषेक करें।
१३. मधु के अभिषेक से तपेदिक दूर हो जाता है।
१४. पापक्षय के लिये शहद से, आरोग्य की कामना से घी से।

१५. दीर्घायु कामना से गो दुग्ध से, लक्ष्मी की कामना से ईख रस से
अभिषेक करना चाहिये।


१६. पुत्रार्थी को शक्कर मिश्रित जल से अभिषेक करना चाहिये।
इससे सम्बन्धित निम्नांकित श्लोक प्रसिद्ध हैं-

जलेन वृष्टिमाप्नोति व्याधिशान्त्यै कुशोदकैः।
दध्ना च पशुकामाय श्रिया इक्षुरसेन च।।
मध्वाच्येन धनार्थी स्यान् मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा।
पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति पयसां चाभिषेचनात्॥
वन्ध्या वा काकवन्ध्या मृतवत्सा च यांगना।
सद्यः पुत्रमवाप्नोति पयसां चाभिषेचनात्॥
ज्वर प्रकोप शान्त्यर्थं जलधारा शिवप्रिया॥
घृतधारा शिवे कार्या यावन्मन्त्र सहस्रक्रम्।
तदा वंशस्य विस्तारो जायते नात्र संशयः॥
प्रमेह रोगशान्त्यर्थ प्राप्नुयान्मनसेप्सितम्।
केवलं दुग्धधारा च तदाकार्या विशेषतः॥

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